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प्रश्न) अपील से आप क्या समझ्ते है? इसके साधारण सिद्धांत क्या है? अपीलिय न्यायालय कि शक्तियो कि विवेचना कीजिए। क्या अपीलिय न्यायालय अतिरिक्त साक्ष्य ले सकता है?

उत्तर) दिवानी प्रक्रिया संहिता कि धारा 96 से 109 तथा आदेश 41 से 45 के अंतर्गत अपील के सम्बंध मे प्रावधान किया गया है। परंतु शब्द अपील को संहिता में कहीं भी परिभाषित नहीं किया गया है। चैम्बर शब्दकोश के अनुसार-
“नीचे की अदालत के विनिश्चय का ऊपर की अदालत द्वारा परीक्षण किया जाना ही अपील है”
दूसरे शब्दों में यह भी कहा जा सकता है कि अपील एक ऐसी कार्यवाही है जिसके द्वारा पराजित पक्षकार अपने विरुध पारित निर्णय को अपास्त करने के लिए ऊपर के न्यायालय में दस्तक देता है। यह किसी निचली अदालत फैसले को ऊपरी अदालत द्वारा न्यायिक जाँच किए जाने  का आवेदन होता है 
नागेंद्रनाथ डे बनाम सुरेशचंद्र डे ए0आई0आर0 1932 पी0सी0 165 के मामले में प्रिवी काउंसिल द्वारा यह अभिनिर्धारित किया गया है कि “नीचे के न्यायालय के विनिश्चय को अपास्त कराने हेतु पक्षकार द्वारा ऊपर के न्यायालय को आवेदन करना ही अपील है।“
आज्ञप्ति या आदेश के पारित होने के पश्चात वाद में सफल पक्षकार आज्ञप्ति या आदेश के निष्पादन हेतु न्यायालय में अग्रसर होता है तो असफल पक्षकार ऐसे आज्ञप्ति या आदेश को निरस्त कराने के लिए न्यायालय की शरण लेते हैं यही उसका अपील का अधिकार है। कभी-कभी दोनों ही पक्षकार किसी आज्ञप्ति या आदेश से व्यथित होते हैं तब वह दोनों ही पक्षकार आज्ञप्ति या आदेश की अपील के लिए अग्रसर होते हैं।
·         संहिता की धारा 96 से 99 तक एवं आदेश 41 में मूल आज्ञप्ती से अपिलों के बारे में प्रावधान किया गया है
·       धारा 104 से 106 एवं आदेश 43 में आदेशों से अपील के संबंध में प्रावधान किया गया है
·     धारा 100 एवं आदेश 42 में द्वितीय अपील जो कि उच्च न्यायालय में होती है के बारे में प्रावधान किया गया है।
·      धारा 109 एवं आदेश 45 में उच्चतम न्यायालय में अपील के संबंध में प्रावधान किया गया है 
अपील में प्रयुक्त होने वाले साधारण सिद्धांत इस प्रकार हैं:
(1) अपील की कार्रवाई संविधि से उत्पन्न हुई है अत: जब तक विधि में कोई उपबंध न हो, अपील नहीं हो सकती।
(2) अपील, वाद या अन्य कार्रवाई की शृंखला है और अपीलीय न्यायालय का निर्णय प्राथमिक रूप से उन्हीं परिस्थितिओं पर आधारित होता है जो नीचे के न्यायालय के विनिश्चय की तिथि पर वर्तमान थीं। किंतु अपील-न्यायालय बाद की घटनाओं पर भी ध्यान दे सकता है और नीचे के न्यायालय की आज्ञप्ति या आदेश में वाद विषय के अनुसार न्यायोचित संशोधन कर सकता या उसे हटा सकता है।
(3) अपील प्रक्रिया का विषय न होकर मौलिक अधिकार का विषय समझी जाती है और यह मान लिया जाता है कि अपील के अधिकार का अहरण करने वाली किसी विधि का प्रयोग चालू अपील या वाद में तब तक नहीं होगा जब तक आवश्यक रूप से उसको भूतलक्षी प्रभाव न दिया गया हो। यदि ऐसा कोई भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया गया है तो चाहे नीचे के न्यायालय के निर्णय के पूर्व ही वह विधि लागू हो चुकी हो, अपील का निर्णय उस विधि के अनुसार होगा जो वाद या अन्य कार्रवाई के आरंभ की तिथि पर लागू था।
(4) साधारणतया अपील का निर्णय नीचे के न्यायालय में प्रस्तुत किए गए साक्ष्य के आधार पर किया जाता है। केवल वही नया साक्ष्य अपील न्यायलय द्वारा स्वीकार किया जाए सकता है, जो किसी पक्ष को समुचित खोज तथा प्रयत्न करने पर भी उस समय प्राप्त नहीं हो सका था जिस समय आरंभ के न्यायालय में वाद का परीक्षण चल रहा था।



अपीलीय न्यायालय की शक्तियां
अपीलीय न्यायालय की शक्तियों का वर्णन सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 की धारा 107 में किया गया है। धारा 107 के अनुसार सिविल कोर्ट को पांच प्रकार की अपीलीय शक्तियां प्राप्त हैं। जो निम्न है-

1.    मामले का अंतिम रूप से विनिश्चय करने की शक्ति
2.    अधीनस्थ न्यायालय को मामले को प्रति प्रेषित करने की शक्ति
3.    विवाद्यको की विरचना करने की शक्ति
4.    अतिरिक्त साक्ष्य लेने या लिया जाना अपेक्षित करने का अधिकार
5.    मूल अधिकारिता या विचारण न्यायालय की भांति कार्य करने की शक्ति

1)    मामले का अंतिम रूप से विनिश्चय करने की शक्ति
जो रिकॉर्ड अपीलीय न्यायालय में लाए गए हैं उनमें साक्ष्य यदि पर्याप्त है तो वह तुरंत मामले का निस्तारण कर सकता हैं। वह अपील का विनिश्चय कर सकता है तथा, ऐसा विनिश्चय करते वक्त वह-
·         निचली अदालत के निर्णय को पुष्ट कर सकेगा
·         निचली अदालत के निर्णय को उलट सकेगा
·         निकली निचली अदालत के निर्णय में सारभूत परिवर्तन कर सकेगा।
·         पक्षकार जैसी डिक्री चाहते हैं सहमति के आधार पर अपील का निर्णय कर सकेगा। अगर पक्षकार समझौता चाहते हैं तो वह समझौता कर सकता है।
·         परंतु अगर न्यायालय निचली अदालत के निर्णय को उलटना चाहता है तो दो बातें देखेगा
o   जो साक्ष्य दिए गए उन पर विचार करेगा
o   उन साक्ष्य पर जो निचली अदालत का निर्णय है या जो कारण बताए गए हैं उनको देखेगा।

2)    अधीनस्थ न्यायालय को मामले को प्रति प्रेषित करने की शक्ति
अपीलीय न्यायालय वाद को निचली अदालत को (लोअर कोर्ट) को प्रेषित (रिमाड) कर सकता है। जब अधीनस्थ न्यायालय प्रारंभिक विनिश्चय द्वारा प्रारंभिक बिंदु पर पूरे वाद को निपटा देता है तथा ऐसे निर्णय को अपील में उलट दिया गया तो अपीलीय न्यायालय वाद प्रतिप्रेषित कर सकता है।
उदाहरण के लिए प्रतिवादी ने कहा कि वाद मर्यादा विधि से वर्जित है, अधीनस्थ न्यायालय ने इस तथ्य को मानते हुए वाद निर्णित किया। वादी द्वारा उक्त निर्णय के खिलाफ अपील की गई। अपीलीय न्यायालय ने उक्त निर्णय को उलट दिया और यह माना कि वाद मर्यादा विधि के अंतर्गत हैं। ऐसे मैं अपीलीय न्यायालय वाद को मूल अधिकारिता वाले न्यायालय में प्रतिप्रेषित करेगा।

3)    विवाद्यको की विरचना करने की शक्ति
अपीलीय न्यायालय को विवाद्यको को बनाने या विरचित करने का अधिकार है। अपीलीय न्यायालय 3 परिस्थितियो में विवाद्यको की विरचना कर सकता है-
a.    जब विचारण न्यायालय ने सारवान विवाद्यक की विरचना नहीं की हो।
b.    विचारण न्यायालय ने विवाद्यक बनाए हो पर उनका विचारण ना किया हो।
c.    तथ्य के प्रश्न का निर्धारण नहीं किया गया तथा ऐसे तथ्य का निर्धारण आवश्यक था।
d.    ऐसे विवाद्यको का लोप किया जिन पर, अपीलीय न्यायालय की राय में विनिश्चय वाद के अंतिम रूप से अवधारण के लिए अत्यंत आवश्यक था।

4)    अतिरिक्त साक्ष्य लेने या लिया जाना अपेक्षित करने का अधिकार
अतिरिक्त साक्ष्य लेने या लिया जाना अपेक्षित करने का अधिकार अपीलीय न्यायालय कुछ विशेष परिस्थितियों में रखता है। आर्डर 41 रूल 27 अपीलीय न्यायालय कि अतिरिक्त साक्ष्य लेने के लिए प्रदान की गई हैं शक्तियों का वर्णन करता है ताकि अपीलीय न्यायालय अपने को निर्णय देने में समर्थ बना सके जो निम्न है-
1)    ऐसा साक्ष्य जो ग्राह्य किया जाना चाहिए था उसको ग्राह्य नहीं किया गया या इंकार कर दिया गया है तो अपीलीय न्यायालय अतिरिक्त साक्ष्य ले सकता है।
2)    जो पक्षकार अतिरिक्त साक्ष्य देना चाहता है यदि यह साबित करता है कि यह तथ्य या साक्ष्य समयक तत्परता के बावजूद पहले उसके संज्ञान में नहीं आया था।
3)    जब अपीलीय न्यायालय की राय में किसी व्यक्ति का साक्ष्य लिया जाना अनिवार्य है या कोई दस्तावेज का आना आवश्यक है। तब न्यायालय ऐसे किसी व्यक्ति की गवाही या दस्तावेज को पेश किए जाने के लिए कहेगा जो न्यायालय को निर्णय सुनाने के लिए समर्थ बनाने के लिए महत्वपूर्ण है।

5)    मूल अधिकारिता या विचारण न्यायालय की भांति कार्य करने की शक्ति
मूल अधिकारिता या विचारण न्यायालय की भांति कार्य करने की शक्ति अपीलीय न्यायालय को प्राप्त है। उपरोक्त शक्तियों के अधीन रहते हुए अपीलीय न्यायालय की वहीं शक्तियां होंती है या वह उन्ही उत्तरदायित्वो के अधीन होता है जिनके अधीन विचारण न्यायालय होता है ताकि वह अपील का गुण अवगुण के आधार पर  निर्धारण कर सके।
हां यह कहना उचित है कि अपीलीय न्यायालय की शक्तियां विचारण न्यायालय से अधिक होती है क्योंकि उसे विचारण न्यायालय की शक्तियां तो प्राप्त होती हैं साथ ही उसे अपीलीय शक्तियां भी प्राप्त हैं।


अपीलीय न्यायालय को ये है शक्तियॉ दी गई है ताकि वह
  • मामले का विनिश्चय गुण अवगुण के आधार पर कर सके।
  • अगर परिस्थितियॉ ऐसी है तो वो अंतर्वर्ती आदेश दे सके।
  • ताकि वह यथापूर्व स्थिति बहाल करवा सके।
  • वाद की विषय वस्तु को संरक्षित रख सकें।

for Second Appeal
https://drnupurgoelcpc1908.blogspot.com/2020/04/100-second-appeal-cpc-section-100-dr.html

Dr Nupur Goel
Assistant Professor
Shri ji institute of legal vocational education and research
( SILVER law collage )
Barkapur Bareilly
Email – nupuradv@gmail.com 

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