#अंतर्निहित_शक्ति_धारा_151_सिविल_प्रक्रिया_संहिता #CPC_section_151 #inherent_powers_of court_in_hindi #DrNupurGoel


प्रश्न)  सिविल न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति के बारे में आप क्या जानते हैं? क्या आप इस मत से सहमत हैं कि न्यायालय को अंतर्निहित शक्ति नहीं प्रदान की गई है यह शक्ति न्यायालय में इस कर्तव्य के आधार पर अंतर्निहित है कि जो पक्षकार इसके सामने हैं, उनको न्याय दे।
पूर्ण रूप से विवेचना कीजिए
उत्तर)  वे सभी अधिकार, जो न्यायालय को, न्याय प्रशासन के दौरान, सही और उचित कदम उठाने के लिए तथा गलत कार्य को रोकने के लिए आवश्यक हैं, से न्यायालय के अंतर्निहित अधिकार का गठन होता है।
सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 151 में न्यायालय के अंतर्निहित क्षेत्राधिकार का वर्णन किया गया है इसके अनुसार-
“ Saving of inherent powers of Court- Nothing in this Code shall be deemed to limit or otherwise affect the inherent power of the Court to make such orders as may be necessary for the ends of justice or to prevent abuse of the process of the Court.”
“न्यायालय कि अंतर्निहित शक्तियो की  व्यावृत्ति – इस सहिता की किसी भी बात के बारे मे यह नही समझा जायेगा कि वह ऐसे आदेशो के देने की न्यायालय की अंतर्निहित शक्ति को परिसीमित या अन्यथा प्रभावित करती है, जो न्याय के उद्देश्यो के लिये या न्यायालय की आदेशिका के दुरुपयोग का निवारण करने के लिये आवश्यक है।“     
गोविंदराम बनाम ए बी जैन  AIR 1939 ALL 665 के वाद में इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अभिनिर्धारित किया की अंतर्निहित शक्ति न्यायालय को साम्य, न्याय एवं शुध अंतःकरण के आधार पर वाद का अवधारण करने की शक्ति देती है।
न्यायाल्य की अंतर्निहित शक्ति इस अवधारणा पर आधारित है की विधि का अनन्य प्रयोजन न्याय के उद्देश्यों को सुनिश्चित रूप से प्राप्त करना है, किंतु अन्याय की स्थिति में न्यायालय को विधियों के अनुसार न चलके उनके निहित उद्देश्यो के आधार पर कार्य करना पड़ता है यहां तक कि कभी-कभी न्याय के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए नियमों को अधिभूत(override) करना पड़ता है, क्योंकि कोई भी नियम या कानून स्वयं ही उद्देश्य नहीं है बल्कि न्याय प्राप्त करने का एक साधन है, अतएव प्रश्नगत पहलुओं के निराकरण हेतु प्रत्येक न्यायालय को कुछ शक्तियां प्राकृतिक रूप से प्राप्त होती हैं, जिन्हें न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियां कहा जाता है।
न्यायालय ने निम्न परिस्थितियो मे अपनी इस शक्ति का प्रयोग कर सकता हैं-
1)     जहां सिविल प्रक्रिया संहिता में कोई प्रक्रिया विहित नहीं है वहॉ न्यायालय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए जो भी उचित समझे आदेश जारी कर सकता है।
2)     जब प्रक्रिया दी गई है एवं कोई व्यक्ति उस प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रहा है तो उसे रोकने के लिए भी वह अंतर्निहित शक्ति का प्रयोग कर सकता है।
उदाहरण के लिए जहां सी पी सी की धारा 10 में दूसरे या बाद में संस्थित होने वाले वाद के विचारण को रुकवाने के उद्देश्य से कोई व्यक्ति पहले एक वाद दाखिल कर देता है तो, न्यायालय 151 के अंतर्गत उसको विधि के उपबंध का ऐसा दुरुपयोग करने से रोक सकता है।
परंतु जहां सिविल प्रक्रिया संहिता किसी कार्य के संबंध में अभिव्यक्त व्यवस्था करते हुए प्रतिषेध करती है, वहां उन अभिव्यक्त प्रावधानों का उल्लंघन करते हुए न्यायालय अंतर्निहित अधिकार का प्रयोग नहीं कर सकता।  उदाहरण के लिए जहां न्यायालय ने कोई निर्णय दे दिया है या सुन लिया है और अगर न्यायालय उसके बाद उस निर्णय में कुछ जोड़ें या परिवर्तन करें तो यह आदेश 20 नियम 3 का सीधा उल्लंघन होगा और वह ऐसा नहीं कर सकता।
प्रायः यह कहा जाता है कि धारा 151 न्यायालय को अंतर्निहित अधिकार प्रदान करती है। परंतु, वास्तव में न्यायालय होने के कारण ही उसमें यह शक्ति पहले से ही अंतर्निहित रहती है, धारा 151 मात्र यह इंगित करती है कि न्यायालय में यह शक्ति है और वे इसका प्रयोग करें।
न्यायालय न्याय का घर है और वे यह कहकर इनकार नहीं कर सकता कि सिविल प्रक्रिया संहिता में कोई व्यवस्था नहीं है अतः न्याय नहीं दिया जा सकता। कोई भी विधि हर समस्या का निदान प्रदान नहीं कर सकती तथा सी0 पी0 सी0 भी इसका अपवाद नहीं है इसलिए न्यायालय को अंतर्निहित अधिकार प्राप्त है।
मनोहर लाल बनाम सेठ हीरालाल AIR 1962 SC 527 के वाद मे उच्चत्तम न्यायालय ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा है कि अंतर्निहित अधिकार न्यायालय को प्रदत्त नहीं किया गया है; यह एक ऐसा अधिकार है जो न्यायालय में अंतर्निहित है क्योंकि उसका कार्य न्याय करना है। धारा 151 अंतर्निहित अधिकार परिद्त्त नहीं करती है वरन यह इंगित करती है कि न्यायालय में ऐसा अधिकार है और उसका उपयोग न्याय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए या न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग रोकने के लिए किया जाना चाहिए। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि 151 के अंतर्गत जो अंतर्निहित शक्ति का प्रावधान है उसके द्वारा अंतर्निहित शक्ति प्रदान नही की गई है वह तो न्यायालय मे थी ही धारा 151 केवल उसको वहां पर इंगित करती है कि न्यायालय में यह शक्ति है।

Dr Nupur Goel
Assistant Professor
Shri ji institute of legal vocational education and research
( SILVER law collage )
Barkapur Bareilly
Email – nupuradv@gmail.com

Comments

Popular posts from this blog

#दिवानी_प्रक्रिया_संहिता_कि_धारा100 #द्वितीय_अपील #second_appeal # CPC_section_100 #DrNupurGoel

#दिवानी_प्रक्रिया_संहिता_कि_धारा_96 # section100_cpc #section107_cpc #अपील #appeal #अपीलिय_न्यायालय_कि_शक्तियां #CPC_section_96to109 #order41_42_43to45 #DrNupurGoel #silver_law_college