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प्रश्न) द्वितीय (second) अपील किन आधारो पर और कहॉ दायर की जा सकती है? ‘सारवान विधिक प्रश्न के सिद्धांत की विवेचना कीजिए।

उत्तर) दिवानी प्रक्रिया संहिता कि धारा 100 के अंतर्गत द्वितीय (second) अपील उच्च न्यायालय मे दयार कि जा सकती है। इसके अनुसार-
उसके सिवाय जैसा कि इस संहिता के पाठ में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अभिव्यक्त रूप से उपबंधित है, उच्च न्यायालय के अधीनस्थ किसी न्यायालय द्वारा अपील में पारित प्रत्येक डिक्री की उच्च न्यायालय में अपील हो सकेगी, यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि उस मामले में विधि का कोई सारवान प्रश्न अंतरवलित है।“
इस प्रकार द्वितीय (second) अपील केवल उच्च न्यायालय मे दाय कि जा सकती है वो भि जब उसमे विधि का कोई सारवान प्रश्न अंतरवलित हो।
विधि का सारवान प्रश्न पद सिविल प्रक्रिया संहिता मे कहीं भी परिभाषित नहीं है। इसकी व्याख्या सर्वोच्च न्यायालय ने सर्वप्रथम चुन्नी लाल बी0 मेह्ता बनाम सेंचुरी स्पिनिंग और मैन्युफैक्चरिंग कंपनी लिमिटेड AIR 1962 SC 1314 के वाद में की। उच्चत्तम न्यायालय ने कहा कि किसी मामले में कोई प्रश्न विधि का सारवान प्रश्न है कि नहीं इसके लिए दो मैं आवश्यक बातें हैं-  
1.    क्या यह व्यापक महत्व का प्रश्न है
2.    क्या यह पक्षकारों के अधिकारों को प्रत्यक्ष था और सार्थक प्रभावित करता है
और यदि उत्तर हां है तो क्या यह खुला प्रश्न है खुला हुआ प्रश्न इस अर्थ में कि क्या ऐसे प्रश्न पर प्रिवी काउंसिल, फेडरल कोर्ट या उच्चतम न्यायालय का कोई निर्णय नहीं आया है तथा इसमें कई परेशानिया है तथा यह वैकल्पिक निर्णय या विचारों की विवेचना की मांग करता है। जहां सुप्रीम कोर्ट ने उस पर निर्णय दे दिया है या उस पर विधि का सिद्धांत प्रतिपादित कर दिया है या तर्क बेतुका है तो वहा द्वितीय अपील नहीं होगी।
1976 के संशोधन के पूर्व न्यायालयो ने द्वितीय अपील के लिए जो आधार बताए थे वो अत्यंत विस्तृत और भ्रामक थे इसलिए धारा 100 में आमूल परिवर्तन कर दिया गया है। 1976 के संशोधन के बाद से अब उच्च न्यायालय में धारा 100 के अंतर्गत वही  अपील होगी जहां विधि का कोई सारवन प्रश्न निहित है। अब प्रक्रिया के आधार पर घटित त्रुटि के लिए दूसरी अपील का किया जाना प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस तरह अब द्वितीय अपील में उच्च न्यायालय की अधिकारिता धारा 100 अंतर्गत केवल उन्हीं अपीलो तक सीमित है जिसमें विधि का सारवान प्रश्न निहित है।

रतनलाल बंशीलाल बनाम किशोरीलाल गोयंका AIR 1993 Cal. 144 के वाद में कोलकाता उच्च न्यायालय ने कहा कि विधि का सारवान प्रश्न होने के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वह व्यापक महत्व का हो। इसमे द्वितीय (second) अपील से संबंधित निम्न महत्वपूर्ण बिंदुओं पर प्रकाश डाला-
1)    जहाँ अधीनस्थ न्यायालय के तथ्य संबंधी निष्कर्ष तर्क विरुद्ध है या साक्ष्य के संकलन एवं मूल्यांकन करने में अवचार किया गया है वहा अपील ग्रहणीय हैं
2)    जहां विधि की प्रयुक्ति गलत हुई है, वहां विधि का सारवान प्रश्न उठता है, और द्वितीय (second) अपील ग्रहणीय हैं
3)    इसी प्रकार जहां तथ्य संबंधी निष्कर्ष साक्ष्य पर आधारित नहीं हैं, वहॉ द्वितीय (second) अपील हो सकती है।
4)    विधि का ऐसा प्रश्न जो वाद के पक्षकारो के अधिकारों को अनन्य रूप से प्रभावित करता है विधि का सारवन प्रश्न होता है। दूसरे शब्दों में विधि के प्रश्न को विधि का सारवान प्रश्न होने के लिए आवश्यक नहीं कि वो सामान्य महत्व का हो।
5)    जहां विधि एवं तथ्य का मिश्रित प्रश्न अंतरवलित है वहां विधि का सारवान प्रश्न उठता है, क्योंकि यह पक्षकारों के अधिकारों को सारभूत रूप से प्रभावित करता हैं। ऐसी स्थिति में व्यथित व्यक्ति को द्वितीय अपील से नहीं रोका जा सकता।
6)    जहां अधीनस्थ न्यायालय के तथ्य संबंधी निष्कर्ष दूषित है, वहां विधि का सार्वान प्रश्न उठता है। अतः द्वितीय (second) अपील हो सकती है।
संतोष हजारी बनाम पुरुषोत्तम तिवारी AIR 2001 SC 965 के वाद में उत्तम न्यायालय ने कहा कि विधि का सारवान प्रश्न होने के लिए आवश्यक है कि
1)    वह वाद-विवाद योग्य हो
2)    जो राष्ट्र की विधि द्वारा या अन्य किसी पूर्व निर्णय द्वारा पहले से सुस्थापित नहीं किया गया हो
3)    जिसका महत्वपूर्ण संबंध उस मामले के निपटारे से हो।

इसी प्रकार गोविंदराजू बनाम मरियम्मान ए आई आर 2005 एस सी 1008 के मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा द्वितीय अपील के लिए निम्नांकित मानक निर्धारित किए गए हैं
1)    विधि का कोई सारभूत प्रश्न विद्यमान हो
2)    ऐसा प्रश्न विवाद योग्य हो
3)    पहले विनिश्चित किया गया नहीं हो तथा
4)    उसका विनिश्चय किया जाना पक्षकारों के अधिकारों के उवधारण के लिए आवश्यक हो।

ईश्वरदास जैन बनाम सोहनलाल ए आई आर 2000 एस सी 426 एवम  के0 राज बनाम मुथम्मा ए आई आर 2001 एस सी 1720 आदी के वादो में उच्चतम न्यायालय द्वारा इस बात को स्पष्ट कर दिया गया है कि द्वितीय अपील के लिए विधि का सारभूत प्रश्न अंतरवलित होना ना केवल आवश्यक है अपितु आज्ञापक भी है।



Dr Nupur Goel
Assistant Professor
Shri ji institute of legal vocational education and research
( SILVER law collage )
Barkapur Bareilly
Email – nupuradv@gmail.com

Comments

  1. Thanks mam ache se samajh m aya h es tareke se .
    Age bhe umeed kerta hu mam hame ayese hi perne ko mile or topics

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